केरल सरकार ने CEC ज्ञानेश कुमार के 2006 के PWD सचिव वाले कार्यकाल की विजिलेंस जाँच के आदेश दिए हैं।
मामला क्या है, अब तक क्या साबित हुआ है और क्या नहीं, पूरी बात सीधी भाषा में :-
पिछले कुछ दिनों से देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार का नाम हर जगह सुनाई दे रहा है। एक तरफ़ केरल में उनके पुराने कार्यकाल की जाँच का मामला है, दूसरी तरफ़ दिल्ली में विपक्ष का विरोध। दोनों बातें आपस में उलझी हुई हैं, इसलिए बहुत से लोग कन्फ्यूज़ हैं कि असल मामला है क्या। ख़बरें खंगालने के बाद जो समझ आया, वो सिलसिलेवार लिख रहा हूँ।
पहले पूरा मामला समझिए
ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के IAS अधिकारी हैं और केरल कैडर से आते हैं। 19 फ़रवरी 2025 को वो देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त बने। उनका कार्यकाल जनवरी 2029 तक है।
बात 2006 की है। तब वो केरल में PWD के सचिव थे। उसी समय केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (KSTP) के तहत एम.सी. रोड का काम चल रहा था, जिससे जुड़े एक कंसोर्टियम में मलेशिया के इंजीनियर ली सी बीन काम कर रहे थे। ख़बरों के मुताबिक़ उन्होंने आत्महत्या कर ली थी और उनके सुसाइड नोट में तत्कालीन PWD सचिव का नाम होने की बात कही गई। उस वक़्त विजिलेंस की शुरुआती जाँच हुई, पर वो आगे नहीं बढ़ी।
अब अचानक यह मामला क्यों उठा?
केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने 4 अक्टूबर के आसपास विजिलेंस जाँच का आदेश दिया। यह एक कांग्रेस नेता की शिकायत के बाद हुआ, जिसमें आरोप था कि पुरानी जाँच बिना ठीक से पूरी हुए बंद कर दी गई, शायद बाहरी दबाव में। चेन्निथला का कहना है कि चूँकि मामला तब का है जब ज्ञानेश कुमार PWD सचिव थे, इसलिए CEC वाली सुरक्षा इस पर लागू नहीं होती।
8 अक्टूबर को केरल के विजिलेंस डायरेक्टर मनोज अब्राहम ने कहा कि फ़ाइलें देखी जा रही हैं और करीब एक हफ़्ते में फ़ैसला होगा कि आगे क्या करना है।
यहाँ एक बात ध्यान रखिए!
अब तक किसी अदालत या जाँच एजेंसी ने ज्ञानेश कुमार को दोषी नहीं ठहराया है। गृह मंत्री ने खुद माना कि उन्होंने सुसाइड नोट ख़ुद नहीं देखा और जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स से है। पुरानी रिपोर्ट्स में भी किसी ठोस निष्कर्ष का ज़िक्र नहीं मिलता। यानी अभी यह आरोप और जाँच का मामला है, फ़ैसला नहीं। ज्ञानेश कुमार की तरफ़ से इस पर कोई सीधा बयान मुझे अपनी खोज में नहीं मिला। जब आएगा, वो भी उतना ही मायने रखेगा।
SIR का विवाद अलग है, पर साथ चल रहा है
इसी दौरान वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर घमासान चल रहा है। INDIA गठबंधन के सांसदों ने इस हफ़्ते तीन दिन लगातार प्रदर्शन किया। मंगलवार को निर्वाचन सदन तक मार्च निकला, बुधवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ और गुरुवार को गांधी स्मारक पर धरना। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने साफ़ कहा है कि लड़ाई जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका है। 5 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच ने ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करने की माँग पर तुरंत आदेश देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पहले चुनाव आयोग और बाक़ी पक्षों का जवाब सुना जाएगा, और नोटिस जारी किया। याचिका में दावा है कि SIR से जुड़े करीब 14 फ़ैसले बाक़ी दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद लिए गए।
यहाँ भी वही बात है कि ये याचिकाकर्ता के दावे हैं और कोर्ट ने अभी इन पर कोई फ़ैसला नहीं दिया।
यहां भी वही बात है कि ये याचिकाकर्ता के दावे हैं और कोर्ट ने अभी इन पर कोई फ़ैसला नहीं दिया।
आगे क्या हो सकता है?
• केरल विजिलेंस अगले हफ़्ते तय करेगा कि पुरानी जाँच दोबारा खुलेगी या नहीं।
• सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का जवाब आएगा, फिर सुनवाई आगे बढ़ेगी।
• CEC को हटाना आसान नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक़ उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही हटाया जा सकता है।
मेरी राय / सुझाव :
इस पूरे मामले में मैं तीन बातें कहना चाहूँगा।
पहली, आरोप और सबूत में फ़र्क़ करना सीखिए। "नाम आया है" और "दोषी साबित हुआ" दो अलग बातें हैं। जब तक जाँच पूरी न हो, किसी एक तरफ़ का फ़ैसला सुनाना जल्दबाज़ी होगी।
दूसरी, केरल विजिलेंस को चाहिए कि जाँच का नतीजा, जो भी हो, जनता के सामने साफ़ रखे। 20 साल पुराना मामला फिर उठा है तो पारदर्शिता ही इसे राजनीतिक रंग से बचा सकती है।
तीसरी, चुनाव आयोग जैसी संस्था पर सवाल उठें तो उसका सबसे अच्छा जवाब सफ़ाई और खुलापन है, चुप्पी नहीं। SIR पर उठे सवालों के जवाब कोर्ट और जनता दोनों के सामने आने चाहिए, क्योंकि चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा लोकतंत्र की बुनियाद है।
- Mr.X

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